में देख सकती हूँ तुम सबको सरको पे चलते हुए, पानी में विगते हुए कवी दोस्त का हाथ पकर के
कवी अकेले
में महसूस कर सकती हूँ इस धरती की मीठी एहे साँस कोबहती हुई हवा जो हमारी साँस बन जाती है
में महसूस कर सकती हूँ वो सब
पर तुम मुझे नि जानते हो
किउंकि में तुम लोगो की तरह इन्सान की आकृति नि पी
में एक कवी न जनम लेने वाली कन्या हूँ
मेरे व् कुछ सपने थे
माँ के शारीर में पलते हुए ही मैंने दुनिया को निहार न शुरू किया था
उनकी आँखों से
सोचती थी इस खुले असमानों में में व् साँस लुंगी
स्कूल फिर कॉलेज जाउंगी
जीने की बहत ज्यादा ख्वाइश थी मुझे
माँ के आँखों से कोशिश करती थी सूरज की किरणों की ताप लेने की
जब पहेली सूरज की रौशनी खिरकी से घर में झांकता था
में तो खिल ल्हिला के हस उठती थी
पर किसीने मेरी हसी की आवाज सुनी ही नि
पर माँ को शायद महसूस होती थी मेरी झरना जैसी हसी की आवाज
वो डरती थी.
उसके हर रात बिना नींद की गुजर ती थी
वो सोचती आपने ही मन में मेरे पहले वाले बहनों के बारे में, जो कवी नि देख पाई थी धरती में गिरती हुई सूरज की किरण
जिन्हें व् मेरी तरह मार दिया था मेरे आपनो ने
में सुन सकती थी मा की आवाज
बेटी हूँ ना!
मा के दर्द को केसे नि समझू!
में आपने ना बोले शब्दों में मा को समझती थी.
बोलती थी मा इस बार थोड़ी सी हिम्मत कर लो..
मुझे नि जाना किसी हॉस्पिटल के दुस्त्बिं में
मा में जीना चाहती हूँ
....पर मा तुम कुछ नि कर पाए..मेरे आपनो ने ही मुझे तुम्हारे शारीर से जबरदस्ती निकल दिया..
जेसे एक पैर को जर से निकल ते है.
जैसे ख़राब हो जाने वाला शारीर के अंश को कट देते है..
तुम सबने मुझे निकल क फेक दिया
पर में तो कोई शारीर क अंश नि हूँ
में तो खुद एक शारीर हूँ
बेटी हूँ तुम सबकी
आगे जाके किसी की बहिन, किसी की माँ बन सकती थी
मेरी आवाज़ तुम ने सुना नि
कल भी nehi
नही अज...
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